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हिन्द-युग्म: ओ मरियम तुम्हीं बताओ....

पुरस्कृत कविता- मरियम तुम्ही बताओ

ओ मरियम! 
मेरे परमेश्वर की माँ! 
तुम्हीं बताओ 
मैं क्या करूँ? 
तुम्हीं बताओ 
मैं कैसे उठाऊं 
अपने परमेश्वर के कृत्यों का अनचाहा बोझ 
जो अनजाने ही हो रहा है पोषित मेरे गर्भ मैं? 
ओ मरियम तुम्हीं बताओ....! 
ओ मरियम!
क्या तुमने भी भोगा था यह अभिशाप 
जो मुझे मिला है 
एक 'कुवारी माँ' बनकर, 
शायद नहीं! 
क्योंकि तब वासना की भूख 
इतनी भड़की नहीं रही होगी 
ना ही मानव इतना कुटिल रहा होगा 
जितना कि आज है 
तुम्हारे पुत्र को 
जो निशानी था तुम्हारे परमेश्वर की 
उसे उन भोले मासूम लोगों ने 
मान लिया दाता
अपना भाग्य विधाता 
मगर....... 
मेरे परमेश्वर की निशानी 
इन्सां नहीं 
जानवर की औलाद होगी....! 
ओ मरियम! 
तुम जान सकती हो मेरे जैसी लाखों मरियामों का दर्द 
जो आज भी

हिन्द-युग्म: वह अपने कुरते का सीवन नहीं छुपा पाई

हिन्द-युग्म: वह अपने कुरते का सीवन नहीं छुपा पाई

पुरस्कृत कविता- सीवन

उसके कुरते की सीवन 
जो उधड़ चुकी थी उसके यौवन से 
जिसे वह उँगलियों से छुपाती थी 
आज और उधड़ चुकी है! 
उसने जोड़ना चाहा था 
एक-एक धेला 
उसे सीने के लिए 
पर हर बार 
पेट की आग 
खा जाती थी 
उसकी सिलाई के पैसे 
और हमेशा की तरह 
वह छुपाती थी उस उधड़न को 
अपनी उँगलियों से!! 
पर आज 
उँगलियाँ बहुत लचर हैं 
बेबस हैं 
उसकी उधड़न छुपाने को 
उसके पेट की तरह 
क्योंकि 
सीवन उधड़ चुकी है 
उसकी अपनी ही उँगलियों से!!


atisay dhanyabad!