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"माँ ! हमारी दिवाली कब होगी! "

शहर के इस और जहाँ
आलीशान फ्लैट जगमगाते हैं
चाइनीस बल्बों की
छन-छनाती रौशनी मैं
वही
शहर के उस ओर
उस गन्दी बस्ती मैं
जहाँ आवारा कुत्तों के झुण्ड
मुह मारतें है
खुले कुड़ेदानो मैं
वही
उसी अँधेरी बस्ती मैं
नन्ही सी
मैली कुचैली
भूखी 'लछमी'
पूछती है माँ से
"माँ ! हमारी दिवाली कब होगी! "

देवि हे स्वतंत्रते......!

देवि हे स्वतंत्रते
शत-शत तुम्हें नमन!
खुशहाल हो, भारत सदा
बने शान्ति का चमन!
देवि हे ............................!

रहे ज्ञान दीप जलता
फैले सदा प्रकाश
नित नवीन ज्ञान का
होता रहे विकास!
हो धान्य-धन से पूर्ण
ये भारत मेरा वतन!
देवि हे ..................!

सदबुद्धि दे हे भारती
मांगूं यही वरदान
मेरे स्वदेश का हर
प्राणी बने महान
झूमे ख़ुशी से साथ
तिरंगे के ये गगन!
देवि हे स्वतंत्रते
शत-शत तुम्हें नमन!

कागज़ के टुकड़ों पर............!

कागज़ के टुकड़ों पर
कलम की नोक से
काटता हूँ जिस्म को
धीरे-धीरे!
जहाँ से रिश्ता लहू
कविता की सकल में
चिल्लाता है
दर्द बनकर
और में असहाय
निरुपाय
टूटता जाता हूँ
जुड़ने की ललक में
अक्षरों की मानिंद !
मात्रा की तरह !
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जाने-अनजाने ......!

मेरे दामन के सब बासी फूल
आज गंगा में
प्रवाहित हो चुके है
तेरी यादों की नमी लेकर
तेरे जिस्म की खुशबू
जो लिपटी थी
चंद गुलाबो की पंखुरियों पर
उन्हें बिखेर आया हूँ मै
उस रेतीली जमीन पर
जहां से उठते कई सवाल
झांक रहे थे
तुम्हारी सकल में
और मैं
मुह बाये
देखता रहा था
उन्हें अनदेखा कर
और खुद को छोड़ आया हूँ
उन सवालों के कटघरे मैं
उसी गंगा तट पर
जहाँ से तुम्हारी यादों का सफ़र
मुझे खीच लाया था
तुम्हारी तरफ
ज्वार बनकर
जाने-अनजाने !

"कौन बांचेगा?"

शब्द मन की अर्गला को, खोल पसरे उर्ध्व होकर, बांचो, कौन बांचेगा? वेदना की पोत कालिख, कह रही है लेखनी भी, बांचो, कौन बांचेगा? कल्पना के नाग जगे, सोये थे जो निद्रा मैं कब से, बांधो, कौन बांधेगा? छंद के सब बांध टूटे, ताल सुर बेताल सारे, नाचो, कौन नाचेगा? मौन चुप्पी तोड़ चीखा इस क्रांति की ज्वाला मैं जलकर, मानो, कौन मानेगा? दाता बता कैसी बला है, हर शख्स क्यों बदला हुआ है, जानो, कौन जानेगा?

"कलेंडर सी जिन्दगी "

चित्र
कलेंडर सी जिन्दगी
बदल रही है हर रोज
दिन तारीख
महीनों की शक्ल में
और धीरे- धीरे
घट रहा है फासला
दुनियावी सफ़र का
हाँ
कलेंडर पर लिखे
काले हर्फो सी जिन्दगी
हर रोज
नई शक्ल में
आकार बदलती
खुद में उलझी सी
तय कर रही है रास्ता
धीरे-धीरे!!
और गुजरते वक़्त की यादें
मौसम सी
करवट लेती हैं
हर शख्स के मन में
जो भर देती है
नए उत्साह से
नव उमंग से
हमारी धमनियों को
और हम
भूल जाते हैं
कम होते फासले
उस कलेंडर की तरह
जो दिवार पर टंगा
अब भी फडफडा रहा है
शान से!!!

"मेरे लिए"

धुंधलाती सांझ की दीवारों पर टिकी
आसमानी छत के नीचे
जब सूरज डूबने लगता है,
अपने घर के कोने में
तो लगता है की
ताम्बे की परात में
बादलों सा श्वेत आटा गूंथे तुम
सूरज की अलाव पर
सेंक रही हो रोटियां
मेरे लिए!!
और मैं घर की राहदरी में टहलता हूँ
तुम्हारे बुलावे तक
और जब तुम आवाज दे
बुलाती हो मुझे चोके पर
खाने के लिए
तो चाँद चुपके से उतर आता है
मेरी थाली में रोटी की तरह!!
...................... नववर्ष २०६७ की शुभकामनायें

गांधीजी तुम्हारे तीन बन्दर.............!

गांधीजी तुम्हारे तीन बन्दर
पहला-------> बीमार है!
दूसरा--------> लाचार है!
तीसरा--------> बेरोजगार है!
ओ बापू! तुम्ही बताओ
क्या तुम्हारे स्वप्निल रामराज्य का भारी बोझ
इन दुर्बल कहारों के कन्धों पर टिक पायेगा!