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माँ तुम्हें भुला नहीं हूँ

माँ तुम्हें भुला नहीं हूँ |
सहर की तंग गलियों में , निशा की मौन गलियों में ,
भीड़ में भी रह अकेला, माँ तुम्हें भुला नहीं हूँ|
                                           माँ तुम्हें भुला नहीं हूँ |
देखता हूँ अब भी रह-रह, नैन भीगे ओंठ सूखे,
काटती थी ओंठ फिर भी, अश्रु रोके से न रोके ,
वह विदाई की घड़ी  माँ, आज भी भुला नहीं हूँ|
                                       माँ तुम्हें भुला नहीं हूँ |
टिमटिमाते तार से वे, नयन थे वात्सल्य झरते,
बैठने को फिर से गोदी, मन में दबे अरमां मचलते,
ममता सनी वाह बांह फैली, माँ उन्हें भुला नहीं हूँ|
                                         माँ तुम्हें भुला नहीं हूँ |
नयन लाते अश्रु भर-भर, ज्यों फूटता हो कोई निर्झर,
शब्द सरे मूक थे जो, लौट जाते थे उभर कर,
माँ तुम्हारी भाव-विह्वल, मूर्ति मैं भुला नहीं हूँ,
                                     माँ तुम्हें भुला नहीं हूँ |

"मैं जनवादी कवि हूँ । ---- जनता का कवि हूँ। "

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मैं जनवादी कवि हूँ  ।  ---- जनता का कवि हूँ।
ये बात तुम्हें ज्ञात होगी,
जब कुछ दिन पूर्व
मैंने एक पुस्तक का
भव्य विमोचन
जनवादी नेता द्वारा करवाया था ।
उसमे उपस्थित भीड़
जो नेता के चंदे से आई थी
हर अखबार की
सुर्ख़ियों पर छायी थी!
जिसके तले  दब मरी थी
एक गरीब , लाचार
पद-दलित साहित्यकार की मौत,
क्योकि मैं जनवादी कवि हूँ । ----- जनता का कवि हूँ ।
मेरी कविताओं में
कहीं भूख नहीं होती,
न ही होती है
ताजमहल के पीछे बसी
मलिन बस्ती की जिजिविषा
और न ही
तोड़ती पत्थर की कहानी |
मैंने जब भी लिखा है
विलायती कारों  की चमचमाती चमक
और विदेशी मेमो के
अन्तःवस्त्रों से आती
विदेशी महक का स्तुतिगान
जो जनता को मोहित करता है
मेरे शब्दों के मायाजाल में फांस कर !
मैंने लिखा है
नेताओं की धूमिल छवि  का
चमकीला चेहरा
जो उनके सफ़ेद झकझक
कुर्ते के कारण
चमकता है काली स्याह रातों में ।
हाँ ! मैं जनवादी कवि हूँ । जनता का कवि हूँ ।
भूख , बेबसी , अत्याचार ,
अन्याय व बलात्कार ,
ये सब हो चुके हैं बौने
जनता के लिए
इसीलिए मैंने
इन्हें  छोड़ दिया
 कलम से कचोटना
क्योकि इनकी टीस
मवाद बन रिसती है पूरे देश में
इसलिए अब मैं लिखता हूँ
सिन…

" भोर का तारा "

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नीले अम्बर में निशा की साड़ी का छोर पकडे  मुस्कुराता है  हठीला  भोर का तारा।  रोकना चाहता है  लजाती - भागती  रजनी को  और झाँकता है  बलात  उसके चेहरे पर।  और रक्ताभ रजनी  तिरछी चितवन फेर  झटक कर  अपना आँचल   दौड़ पड़ती है  क्षितिज की ओर  और तारा  निस्तेज हो  विलीन हो जाता है  भोर की लालिमा में !

कितने गीत रह गए अगाये ॥

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कितने गीत रह गए अगाये ,
अपने भी बन गए पराये ।
नहीं मानता मन विद्रोही ,
किसको समझायें ?
बिछुड़े जन कितने ही प्रियजन,
टूटे  स्वप्नों के अनगिन दरपन ।
आशायें - नैराश्य भाव बन,
मन में  घन - बन छायें ॥
टूटे साजों के सुमधुर स्वर,
मूक हुए कविता के भी स्वर।
हुए ईश भी आज अनिश्वर ,
किसको बतलायें ?
प्रश्न खड़े देहरी पर उलझे ,
कैसे भी यह उलझन सुलझे ।
उत्तर हुए निरुत्तर सारे,
किस विधि सुलझायें ?
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मैले कागज़ पर ।

मैले  कागज़ पर
शब्दों की छितरायी  लाशें
पड़ी हैं अस्त-व्यस्त ,
जिनके  अंगों को
जोड़ता हूँ मैं
और करता हूँ कोशिश
उन्हें पहचानने की,
ढूंढता हूँ
उनके अर्थ
जो लथपथ हैं
थक्का बने
खून के सरोवर में
जहाँ से आती
सड़ांध
बताती है
की ये शब्द
सड़  चुके  हैं
और खो चुके हैं
अपनी पहचान
यहीं - कहीं !!!

क़यामत

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मैं , हर रात
ख़ुदकुशी  करता हूँ
और भोर तक
ओढ़े रहता हूँ ,
मौत की ख़ामोशी का लबादा ।
और सुबह जब
ये लबादा उतार
मैं जागता हूँ  नींद से
तो लगता है की
क़यामत
आ चुकी है मेरे शहर में
और मुझ जैसे
कई मुर्दे -निकल आये हैं
अपनी कब्रों  से ---सड़कों पर ।

कई दिनों के बाद!!!!!

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एक सन्नाटा सा पसरा पड़ा है, इस सुनसान रेतीली जमीन की छाती के बीच! एक अजीब सी चुप्पी है, कई दिनों के बाद! कई दिनों बाद लहू सने होंठ खामोश हैं लहू सनी कटारें, बंदूकें, तोपें, मूक हैं ! बस फैली है तो बारूद की गंध हर जगह; हर तरफ एक धुंआ सा है जो गोला बन सिमटा है छातियों में  हर शख्स की, ये धुंआ माँ  की छातियों से गुजरकर जमा हो रहा है अबोध बच्चों के उदर में तभी तो उनके होंठ हो चुके हैं बिलकुल काले और आँखें किसी सोच में  खोयी हुई सी ढूंड रही है इधर -उधर किसी चीज को !!! यही धुंआ जमा हो रहा है हर  जिन्दा शख्स के अंतस  में जो चुप है उसे घुटक कर जाने कैसी चुप्पी है यह