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कर्मयोगी ‘अब्दुल कलाम’ (महान वैज्ञानिक , भारत रत्न , मिसाइल मैन, पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम जी के निधन पर विनम्र श्रद्धांजलि)

कर्मयोगी ‘अब्दुल कलाम’
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देकर अग्नि को नए पंख,
और देश को नव आयाम |
चला गया भारत-सपूत ,
कर्मयोगी ‘अब्दुल कलाम’ ||
देकर हर मन को नयी सोच,
दे नवल सृजन का विजय घोष |
तम से लड़ने की नवल शक्ति ,
भर गया सभी में नवल जोश |
तुम सृजनहार नव भारत के,
तुमसे भारत का स्वाभिमान |
ओ कलाम ! भारत – गौरव ,
तुम्हें याद करेगा हिन्दुस्तान ||
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गर्म लावा

ठन्डे लोहे के गर्भ से,
दहकता गर्म लावा 
बाहर निकलकर बिंध जाता 
है ह्रदय को 
और धारा रक्त की है फ़ैल जाती
राजपथ पर
सुनसान अँधेरी रात को,
एक मानव फडफडाता
है जमी पर
और दूजा हँस के
चल देता है अपनी राह को
दूर मानवता खडी थी
बदहवास
और जालिम चीटियां अब
चढ़ गयी हैं लाश पर........

मेरे घर की दिवार पर.....!

दिवार पर फिर उग आई हैं चंद आकृतियाँ आज की शक्ल  में! पतली सी चंद लकीरें मन के भीतर तक धंस गयी हैं ... और एक शख्स झूलता नजर आया है वेदना के सलीब पर उल्टा... बिलकुल उल्टा... जहाँ चंद रस्सियाँ बंधी हैं  उसकी टांगों में और गला ..... कटा गया है नश्तर से कहीं गहरे तक दूर कहीं उखड़ा हुआ प्लास्टर बन गया है उखड़ी सांसो का प्रतीक और खून ................... कोने में लगे - मकड़ी के जाले सा चिपका हुआ है मेरी आँखों में... और एक मुक्कम्मल पर अधूरी सी तस्वीर उभर आती है...
मेरे घर की दिवार पर.....!

जश्न-ए-आजादी!

अडसठ साल व्यतीत हुए ... लगता है ज्यों कल की बात ... देश हमारा छोड़ के दुश्मन भागा था घर आधी रात .... पहली किरण ले कर आई थी उस दिन कुछ ऐसा पैगाम हर्षाया था जन-गण-मन लेकर आजादी की मुस्कान ... अश्रुधार थी हर आँखों में हर मन बहका –बहका सा था ... आजादी की नव बयार से, हर आँगन महका –महका सा था ... याद शहीदों की ले मन में लहराई थी बड़े शान से, लाल किले पर तीन रंग की विजय पताका आसमान  में... कोटि –कोटि कंठो से निकली थी जयकार हिन्द की उस दिन आजादी की डोली से जब नयी सुबह उतरी थी इस दिन.... नया जोश –नूतन स्वप्नों का मन में नव उत्साह भरे दिवस स्वतंत्रता सदा सर्वदा नवल शक्ति संचार करे ... आओ मिलकर आजादी का मिलकर गौरवगान करें वीर शहीदों के स्वप्नों का नव भारत निर्माण करें !