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शनिवार, 20 मार्च 2010

"मेरे लिए"


धुंधलाती सांझ की दीवारों पर टिकी
आसमानी छत के नीचे
जब सूरज डूबने लगता है,
अपने घर के कोने में
तो लगता है की
ताम्बे की परात में
बादलों सा श्वेत आटा गूंथे तुम
सूरज की अलाव पर
सेंक रही हो रोटियां
मेरे लिए!!
और मैं घर की राहदरी में टहलता हूँ
तुम्हारे बुलावे तक
और जब तुम आवाज दे
बुलाती हो मुझे चोके पर
खाने के लिए
तो चाँद चुपके से उतर आता है
मेरी थाली में रोटी की तरह!!
...................... नववर्ष २०६७ की शुभकामनायें

गांधीजी तुम्हारे तीन बन्दर.............!


गांधीजी तुम्हारे तीन बन्दर
पहला-------> बीमार है!
दूसरा--------> लाचार है!
तीसरा--------> बेरोजगार है!
ओ बापू! तुम्ही बताओ
क्या तुम्हारे स्वप्निल रामराज्य का भारी बोझ
इन दुर्बल कहारों के कन्धों पर टिक पायेगा!

रविवार, 1 नवंबर 2009

हिन्द-युग्म: ओ मरियम तुम्हीं बताओ....

पुरस्कृत कविता- मरियम तुम्ही बताओ

ओ मरियम! 
मेरे परमेश्वर की माँ! 
तुम्हीं बताओ 
मैं क्या करूँ? 
तुम्हीं बताओ 
मैं कैसे उठाऊं 
अपने परमेश्वर के कृत्यों का अनचाहा बोझ 
जो अनजाने ही हो रहा है पोषित मेरे गर्भ मैं? 
ओ मरियम तुम्हीं बताओ....! 
ओ मरियम!
क्या तुमने भी भोगा था यह अभिशाप 
जो मुझे मिला है 
एक 'कुवारी माँ' बनकर, 
शायद नहीं! 
क्योंकि तब वासना की भूख 
इतनी भड़की नहीं रही होगी 
ना ही मानव इतना कुटिल रहा होगा 
जितना कि आज है 
तुम्हारे पुत्र को 
जो निशानी था तुम्हारे परमेश्वर की 
उसे उन भोले मासूम लोगों ने 
मान लिया दाता
अपना भाग्य विधाता 
मगर....... 
मेरे परमेश्वर की निशानी 
इन्सां नहीं 
जानवर की औलाद होगी....! 
ओ मरियम! 
तुम जान सकती हो मेरे जैसी लाखों मरियामों का दर्द 
जो आज भी
छोड़ देती हैं, 
अपने परमेश्वर की निशानी 
किसी अनाथालय, वाचनालय, 
मंदिर या गिरजाघर के 
किसी सुनसान कोने में. 
या फिर समय से पहले 
कालकलवित हो जाती है 
नन्ही रूह
ओ मरियम, 
तुम जान सकती हो मेरा दर्द 
तुम्हीं बताओ
क्या करूँ मैं................!

kaushik sahab, manoj ji, rashmiji, rachna ji, vinod ji,asha ji, kishore ji, aap sabhi logon ne kavita ko padha uski sarahna ki, atisay dhanyabad

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

हिन्द-युग्म: वह अपने कुरते का सीवन नहीं छुपा पाई

हिन्द-युग्म: वह अपने कुरते का सीवन नहीं छुपा पाई

पुरस्कृत कविता- सीवन

उसके कुरते की सीवन 
जो उधड़ चुकी थी उसके यौवन से 
जिसे वह उँगलियों से छुपाती थी 
आज और उधड़ चुकी है! 
उसने जोड़ना चाहा था 
एक-एक धेला 
उसे सीने के लिए 
पर हर बार 
पेट की आग 
खा जाती थी 
उसकी सिलाई के पैसे 
और हमेशा की तरह 
वह छुपाती थी उस उधड़न को 
अपनी उँगलियों से!! 
पर आज 
उँगलियाँ बहुत लचर हैं 
बेबस हैं 
उसकी उधड़न छुपाने को 
उसके पेट की तरह 
क्योंकि 
सीवन उधड़ चुकी है 
उसकी अपनी ही उँगलियों से!!


atisay dhanyabad!