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शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

हिन्द-युग्म: वह अपने कुरते का सीवन नहीं छुपा पाई

हिन्द-युग्म: वह अपने कुरते का सीवन नहीं छुपा पाई

पुरस्कृत कविता- सीवन

उसके कुरते की सीवन 
जो उधड़ चुकी थी उसके यौवन से 
जिसे वह उँगलियों से छुपाती थी 
आज और उधड़ चुकी है! 
उसने जोड़ना चाहा था 
एक-एक धेला 
उसे सीने के लिए 
पर हर बार 
पेट की आग 
खा जाती थी 
उसकी सिलाई के पैसे 
और हमेशा की तरह 
वह छुपाती थी उस उधड़न को 
अपनी उँगलियों से!! 
पर आज 
उँगलियाँ बहुत लचर हैं 
बेबस हैं 
उसकी उधड़न छुपाने को 
उसके पेट की तरह 
क्योंकि 
सीवन उधड़ चुकी है 
उसकी अपनी ही उँगलियों से!!


atisay dhanyabad!

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