कागज़ के टुकड़ों पर............!

कागज़ के टुकड़ों पर
कलम की नोक से
काटता हूँ जिस्म को
धीरे-धीरे!
जहाँ से रिश्ता लहू
कविता की सकल में
चिल्लाता है
दर्द बनकर
और में असहाय
निरुपाय
टूटता जाता हूँ
जुड़ने की ललक में
अक्षरों की मानिंद !
मात्रा की तरह !
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