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गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

सलाम उसको....!

मजदूर 
जिसके परिश्रम से 
धरती सीना चीरकर 
उगाती है 
अन्न रूपी सोना 
जो भरता है पेट 
सारे जहान का ।
मजदूर 
जिसके खून का एक-एक कतरा 
सींचता है 
हमारे घरों की बुनियाद ।
मजदूर 
जिसके पेट की आग 
दे रही ईधन 
विकसित होती सभ्यताओं को 
वही मजदूर 
जिसकी मुट्ठी में बंद है
सारे संसार का पुरुषार्थ ।
सलाम उस मूर्ति को
जिसने बना लिया है खुद को 
तपता हुआ रेगिस्तान
ताकि लहलहा सके 
भविष्य की फसल 
और 
साकार हो सपना
नये विकसित विश्व का ।

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