जिसके परिश्रम से
धरती सीना चीरकर
उगाती है
अन्न रूपी सोना
जो भरता है पेट
सारे जहान का ।
मजदूर
जिसके खून का एक-एक कतरा
सींचता है
हमारे घरों की बुनियाद ।
मजदूर
जिसके पेट की आग
दे रही ईधन
विकसित होती सभ्यताओं को
वही मजदूर
जिसकी मुट्ठी में बंद है
सारे संसार का पुरुषार्थ ।
सलाम उस मूर्ति को
जिसने बना लिया है खुद को
तपता हुआ रेगिस्तान
ताकि लहलहा सके
भविष्य की फसल
और
साकार हो सपना
नये विकसित विश्व का ।