" भोर का तारा "

नीले अम्बर में 
निशा की साड़ी का छोर पकडे 
मुस्कुराता है  हठीला 
भोर का तारा। 
रोकना चाहता है 
लजाती - भागती 
रजनी को 
और झाँकता है 
बलात 
उसके चेहरे पर। 
और रक्ताभ रजनी 
तिरछी चितवन फेर 
झटक कर 
अपना आँचल 
 दौड़ पड़ती है 
क्षितिज की ओर 
और तारा 
निस्तेज हो 
विलीन हो जाता है 
भोर की लालिमा में !
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