कितने गीत रह गए अगाये ॥

कितने गीत रह गए अगाये ,
अपने भी बन गए पराये ।
नहीं मानता मन विद्रोही ,
किसको समझायें ?
बिछुड़े जन कितने ही प्रियजन,
टूटे  स्वप्नों के अनगिन दरपन ।
आशायें - नैराश्य भाव बन,
मन में  घन - बन छायें ॥
टूटे साजों के सुमधुर स्वर,
मूक हुए कविता के भी स्वर।
हुए ईश भी आज अनिश्वर ,
किसको बतलायें ?
प्रश्न खड़े देहरी पर उलझे ,
कैसे भी यह उलझन सुलझे ।
उत्तर हुए निरुत्तर सारे,
किस विधि सुलझायें ?
----)(-------
एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कालिन्दी हूँ मैं।

बेच डालो - OLX

जब भी .....!